क्यों भारत के लड़के और लड़कियां बच्चे पैदा नहीं कर पा रहे हैं?

क्यों भारत के लड़के और लड़कियां बच्चे पैदा नहीं कर पा रहे हैं?

जब 32 वर्षीय अंकित और उनकी पत्नी प्रिया ने शादी के तीन साल बाद परिवार शुरू करने का फैसला किया, तो उन्हें यह उम्मीद नहीं थी कि उन्हें किसी समस्या का सामना करना पड़ेगा। लेकिन दो साल की कोशिशों के बाद भी जब वे सफल नहीं हुए, तो डॉक्टर से मिलने पर पता चला कि दोनों में ही प्रजनन संबंधी समस्याएं हैं। उनकी कहानी अकेली नहीं है – यह आज के भारत में लाखों जोड़ों की कहानी है।

आज भारत एक विरोधाभास में फंसा है। एक तरफ हम दुनिया की सबसे अधिक आबादी वाला देश बन गए हैं, लेकिन दूसरी तरफ हमारी प्रजनन दर (Total Fertility Rate) घटकर 1.9 पर आ गई है, जो कि प्रतिस्थापन स्तर 2.1 से भी कम है। यूनाइटेड नेशंस पॉपुलेशन फंड (UNFPA) की 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत की जनसंख्या 146.39 करोड़ है और अगले 40 वर्षों में यह 170 करोड़ पर पहुंचकर घटने लगेगी। लेकिन असली सवाल यह है – क्यों आज की पीढ़ी अपने दादा-दादी और नाना-नानी की तरह 4-5 बच्चे नहीं कर पा रही?

IVF का बढ़ता बाज़ार: आंकड़े जो चौंकाने वाले हैं

भारत में IVF (इन विट्रो फर्टिलाइजेशन) का बाज़ार तेजी से बढ़ रहा है और यह वृद्धि हमारी प्रजनन समस्याओं की गंभीरता को दर्शाती है। 2024 में भारत का IVF बाज़ार 864.6 मिलियन डॉलर तक पहुंच गया था और 2033 तक यह 3,458.3 मिलियन डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है – यानी 15.4% की वार्षिक वृद्धि दर।

Indira IVF, जो भारत की सबसे बड़ी फर्टिलिटी चेन है, का विस्तार इस समस्या की व्यापकता को दर्शाता है। 1988 में उदयपुर, राजस्थान में डॉ. अजय मुर्डिया द्वारा एक छोटे से क्लिनिक के रूप में शुरू हुई यह कंपनी अब अगस्त 2024 तक देश भर में 149 केंद्रों के साथ काम कर रही है। कंपनी का राजस्व 2024 में 1,490 करोड़ रुपये तक पहुंच गया, जो पिछले वर्ष की तुलना में 21.3% की वृद्धि दर्शाता है। इसके कर्मचारियों की संख्या 3,051 है, जो इस क्षेत्र में बढ़ती मांग का सीधा संकेत है।

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि Indira IVF की सफलता दर 74% तक पहुंचती है, जो दुनिया के कई विकसित देशों के बराबर है। 35 वर्ष से कम उम्र की महिलाओं में यह दर 60% तक है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि भारत में प्रति मिलियन लोगों पर केवल 210 IVF साइकिल होती हैं? अमेरिका में यह संख्या 1,200 और यूरोप में 2,000 से अधिक है। इसका मतलब है कि भारत में अभी भी बहुत बड़ी संख्या में लोग IVF की सुविधा तक नहीं पहुंच पा रहे हैं।

भारत में बांझपन की दर लगभग 15% है, लेकिन IVF सेवाएं केवल 25% एड्रेसेबल मार्केट तक पहुंच पाती हैं। यानी जो लोग इलाज चाहते हैं, उनमें से 75% लोगों को सुविधा नहीं मिल पा रही है। देश में अनुमानित 22 से 33 मिलियन जोड़े बांझपन से जूझ रहे हैं, और इनमें से 40-50% मामलों में महिला कारक जिम्मेदार है, जबकि 30-40% में पुरुष कारक।

राज्यवार स्थिति: किन राज्यों में IVF की सबसे अधिक मांग है?

देश के विभिन्न राज्यों में प्रजनन दर और IVF की मांग में भारी अंतर है। यह भिन्नता आर्थिक स्थिति, शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाओं और सामाजिक मान्यताओं पर निर्भर करती है।

दिल्ली, मुंबई, अहमदाबाद, चेन्नई, कोलकाता, हैदराबाद, बेंगलुरु और पुणे – ये आठ प्रमुख महानगर देश के 50% IVF साइकिल के लिए जिम्मेदार हैं। यह आंकड़ा दर्शाता है कि IVF सुविधाएं भौगोलिक रूप से असमान रूप से वितरित हैं। बड़े शहरों में सुविधाएं आसानी से उपलब्ध हैं, जबकि छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों को इलाज के लिए दूर जाना पड़ता है।

दिल्ली की प्रजनन दर घटकर 1.6 पर आ गई है, जो देश में सबसे कम में से एक है। इसके बाद केरल (1.6), तमिलनाडु (1.7), और कर्नाटक (1.7) का स्थान आता है। सिक्किम में तो यह दर चौंका देने वाली 1.1 तक गिर गई है, जिसके कारण राज्य सरकार को एक से अधिक बच्चे वाले कर्मचारियों को अतिरिक्त वेतन वृद्धि, मुफ्त चाइल्डकेयर, पितृत्व अवकाश और IVF के लिए वित्तीय सहायता जैसे कदम उठाने पड़े हैं।

दक्षिण भारत के राज्यों में प्रजनन दर सबसे कम है। आंध्र प्रदेश में यह 1.5 है, जो यूरोपीय संघ (1.46) और ऑस्ट्रेलिया (1.5) के बराबर है। मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने जनवरी 2025 में स्थानीय चुनावों के लिए उन उम्मीदवारों को अयोग्य घोषित करने का सुझाव दिया जिनके दो से कम बच्चे हैं – यह परिवारों को अधिक बच्चे पैदा करने के लिए प्रोत्साहित करने का प्रयास था। दिलचस्प बात यह है कि तीन महीने पहले तक राज्य में दो से अधिक बच्चों वाले लोगों को चुनाव लड़ने से रोकने वाला कानून लागू था, जिसे 30 वर्षों बाद अक्टूबर 2024 में ही हटाया गया।

दूसरी ओर, बिहार (2.98), मेघालय (2.91), उत्तर प्रदेश (2.35), झारखंड (2.26) और मणिपुर (2.17) में प्रजनन दर अभी भी प्रतिस्थापन स्तर से ऊपर है। यह “उच्च प्रजनन और निम्न प्रजनन की दोहरी प्रकृति” आर्थिक अवसरों, स्वास्थ्य सेवा तक पहुंच, शिक्षा स्तर और प्रचलित लैंगिक और सामाजिक मानदंडों में अंतर को दर्शाती है।

UNFPA की 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, गोवा, केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु, तेलंगाना, सिक्किम, हिमाचल प्रदेश और दिल्ली जैसे राज्यों में बांझपन का प्रसार 20% से अधिक है और प्रजनन दर 2 से कम है। अहमदाबाद के पेरी-अर्बन क्षेत्र में किए गए एक अध्ययन में 7.4% की बांझपन व्यापकता दर पाई गई, जिसमें 3.5% प्राथमिक बांझपन और 3.9% द्वितीयक बांझपन था।

महानगरों में IVF की मांग सबसे अधिक है क्योंकि यहां देर से शादी करना, करियर पर ध्यान केंद्रित करना, तनावपूर्ण जीवनशैली और प्रदूषण जैसे कारक प्रजनन क्षमता को प्रभावित करते हैं। मुंबई और दिल्ली जैसे शहरों में जहां वायु प्रदूषण का स्तर खतरनाक सीमा को पार करता है, वहां पुरुषों और महिलाओं दोनों में प्रजनन समस्याएं अधिक देखी जा रही हैं।

कारण: क्यों आज की पीढ़ी अपने दादा-दादी की तरह 4-5 बच्चे नहीं कर पा रही?

यह सवाल सिर्फ चिकित्सीय नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक भी है। हमारे दादा-दादी की पीढ़ी में 4-5 बच्चे होना आम बात थी। 1960 में, जब भारत की जनसंख्या लगभग 43.6 करोड़ थी, औसत महिला के लगभग छह बच्चे होते थे। लेकिन आज स्थिति पूरी तरह बदल गई है।

चिकित्सीय कारण सबसे प्रमुख हैं। पुरुषों में शुक्राणुओं की गुणवत्ता और संख्या में गिरावट एक गंभीर समस्या बन गई है। पिछले 50 वर्षों में पुरुषों की स्पर्म काउंट में लगभग 50% की गिरावट आई है। आधुनिक जीवनशैली इसके लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार है – लैपटॉप को गोद में रखकर घंटों काम करना, मोबाइल फोन को जेब में रखना, तनाव, धूम्रपान, शराब, प्रोसेस्ड फूड और व्यायाम की कमी।

महिलाओं में भी कई चिकित्सीय समस्याएं बढ़ रही हैं। PCOS (पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम) का प्रसार 3.7% से 22.5% तक है। एंडोमेट्रियल ट्यूबरकुलोसिस लगभग 18% महिलाओं को प्रभावित करता है। मोटापा 1998 में 10.6% से बढ़कर 2014 में 24.7% हो गया है। यौन संचारित रोग भी बढ़ रहे हैं।

आर्थिक कारण भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। UNFPA के सर्वेक्षण में 38% भारतीय उत्तरदाताओं ने कहा कि आर्थिक तंगी उनके कम बच्चे करने का मुख्य कारण है। 21% ने नौकरी की असुरक्षा या बेरोजगारी को जिम्मेदार ठहराया। 22% ने आवास समस्याओं और 18% ने किफायती चाइल्डकेयर की कमी का उल्लेख किया।

आज एक बच्चे को पालना, उसकी अच्छी शिक्षा, स्वास्थ्य देखभाल और भविष्य सुरक्षित करना बहुत महंगा हो गया है। प्राइवेट स्कूल की फीस, कोचिंग क्लासेज, एक्स्ट्रा-करिकुलर एक्टिविटीज – ये सब मिलाकर लाखों रुपये सालाना का खर्च होता है। ऐसे में 4-5 बच्चों को पालना ज्यादातर परिवारों के लिए असंभव है।

सामाजिक कारण भी बदल गए हैं। पहले बड़े परिवार को ईश्वर का आशीर्वाद और आर्थिक आवश्यकता दोनों माना जाता था। खेतों में काम करने के लिए ज्यादा हाथों की जरूरत होती थी। लेकिन आज अर्थव्यवस्था कृषि से सेवा और उद्योग क्षेत्र की ओर बढ़ चुकी है। “अधिक बच्चे, अधिक कमाने वाले हाथ” का सिद्धांत अब लागू नहीं होता।

शिक्षा और जागरूकता ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। 1960 में, 4 में से 1 से भी कम महिला किसी प्रकार का गर्भनिरोधक उपयोग करती थी और आधी से भी कम ने प्राथमिक स्कूल में पढ़ाई की थी। आज शिक्षा में वृद्धि हुई है, प्रजनन स्वास्थ्य तक पहुंच बेहतर हुई है, और अधिक महिलाओं को अपने जीवन को प्रभावित करने वाले निर्णयों में आवाज मिली है।

विवाह की उम्र में वृद्धि भी एक प्रमुख कारण है। पहले 16-18 वर्ष की उम्र में विवाह हो जाता था, लेकिन आज शहरी क्षेत्रों में महिलाएं 25-28 वर्ष की उम्र में और पुरुष 28-32 वर्ष की उम्र में शादी करते हैं। उच्च शिक्षा और करियर को प्राथमिकता देने के कारण यह देरी होती है। देर से शादी करने का मतलब है कि बच्चे पैदा करने के लिए कम समय बचता है।

करियर की महत्वाकांक्षाएं, विशेष रूप से महिलाओं में, भी बदलाव का कारण हैं। आज की महिलाएं केवल गृहिणी नहीं बनना चाहतीं। वे अपना करियर बनाना चाहती हैं, आर्थिक रूप से स्वतंत्र होना चाहती हैं। बच्चे पैदा करना और पालना करियर में एक बड़ा ब्रेक लगाता है, इसलिए महिलाएं कम बच्चे और देर से करने का निर्णय लेती हैं।

पर्यावरणीय कारक भी महत्वपूर्ण हैं। वायु प्रदूषण, प्लास्टिक में पाए जाने वाले रसायन (BPA), कीटनाशक, हेवी मेटल्स – ये सब हमारे प्रजनन तंत्र को नुकसान पहुंचा रहे हैं। चीन में किए गए अध्ययनों से पता चला है कि उच्च प्रदूषण वाले क्षेत्रों में रहने वाले पुरुषों में शुक्राणुओं की गतिशीलता में 18% की कमी देखी गई।

पहली पीढ़ी की कहानी: जब बच्चे होना “भगवान का उपहार” था

सरस्वती देवी, जो अब 64 वर्ष की हैं, की कहानी पिछली पीढ़ी की सोच को दर्शाती है। 1976 में 16 वर्ष की उम्र में उनकी शादी हुई। 30 वर्ष की उम्र तक उन्होंने पांच बेटों को जन्म दिया। गांव की सभी महिलाओं के लगभग इतने ही बच्चे होते थे। “अगर किसी के कम बच्चे होते, तो लोग सोचते थे कि वह बीमार है,” सरस्वती बताती हैं।

वह समय बड़े परिवारों को आशीर्वाद और आर्थिक आवश्यकता दोनों के रूप में देखा जाता था। बच्चे पैदा करना “भगवान का उपहार” माना जाता था। “मेरी सास हमेशा कहती थीं, ‘जितने अधिक बच्चे होंगे, उतने अधिक हाथ खेतों में काम करने के लिए होंगे’।”

गर्भावस्था में अंतर या परिवार के आकार को सीमित करने की बातचीत दुर्लभ थी। “उस समय हम गर्भनिरोधकों के बारे में नहीं जानते थे,” वह कहती हैं। “हम नहीं जानते थे कि गर्भधारण को कैसे टाला या रोका जाए, और हम पूछने से भी डरते थे।”

दोस्तों, पड़ोसियों और विशेष रूप से सास का दबाव उनके कितने बच्चे हुए, इस पर बहुत प्रभाव डालता था। “जब मैं बच्चे पैदा करना बंद करना चाहती थी, तो मेरी सास ने जोर दिया कि मैं जारी रखूं, और मैं उनकी अवज्ञा नहीं कर सकती थी।”

आज सरस्वती कहती हैं कि अगर वह फिर से कर सकतीं, तो कम बच्चे करतीं। “हमारे संघर्षों के बावजूद, मैं अपने परिवार से खुश हूं। मेरे सभी बच्चों ने कुछ शिक्षा प्राप्त की है। मैं घर में काम करने और खेत में अपने पति की मदद करने के बीच अपना समय बांटती हूं।”

दूसरी पीढ़ी: परिवर्तन की शुरुआत

अनिता देवी, सरस्वती की बहू, 1990 के दशक के अंत में 18 वर्ष की उम्र में शादी हुई। अपनी सास के विपरीत, अनिता परिवार नियोजन के बारे में जानती थी और गांव में आने वाले स्वास्थ्य कर्मियों से इसे प्राप्त कर सकती थी। फिर भी, उसके छह बच्चे हुए – चार बेटियां और दो बेटे।

“मेरे पति और सास अधिक बच्चे चाहते थे, खासकर एक बेटा,” अनिता कहती हैं। “मैं थकी हुई महसूस करती थी, लेकिन मेरा इस मामले में बहुत कम कहना था।”

वह जोड़ती हैं, “मैं शुरू में केवल एक या दो बच्चे चाहती थी, बस एक लड़की और एक लड़का। हम गरीब हैं, और एक बड़े परिवार को पालना मुश्किल है… लेकिन परिवार नियोजन के बारे में बात करना मेरे परिवार में आसान नहीं था, और मेरे पति गर्भनिरोधन के खिलाफ थे।”

तीसरी पीढ़ी: स्वतंत्र निर्णय

पूजा कुमारी, अनिता की 26 वर्षीय बेटी, ने 22 वर्ष की उम्र में शादी करने से पहले विश्वविद्यालय से स्नातक किया। उसका पहला बच्चा 23 वर्ष की उम्र में हुआ। अगले तीन वर्षों में, उसने अपने समुदाय में फ्रंटलाइन स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के एक समूह, Accredited Social Health Activist द्वारा प्रदान किए गए गर्भनिरोधकों का उपयोग किया। हाल ही में उसने दूसरा बच्चा करने का फैसला किया।

“मेरे पति और मैंने केवल दो बच्चे करने का फैसला किया है,” पूजा कहती हैं। “हम उन्हें अच्छी तरह से पालना चाहते हैं, उन्हें अच्छी शिक्षा प्रदान करना चाहते हैं, और अपने परिवार के लिए एक सुरक्षित भविष्य सुनिश्चित करना चाहते हैं। सीमित वित्तीय संसाधनों के साथ, हमें लगता है कि एक छोटा परिवार सबसे अच्छा है।”

पूजा कहती हैं कि बच्चे के जन्म के बाद, वह काम करने और अपने घर में आर्थिक रूप से योगदान करने की योजना बना रही है। यह बदलाव तीन पीढ़ियों में भारतीय समाज में हुए परिवर्तन को दर्शाता है।

ओवरपॉपुलेशन एक मिथक है: सच्चाई क्या है?

बहुत से लोग सोचते हैं कि भारत में अभी भी जनसंख्या विस्फोट हो रहा है, लेकिन यह धारणा गलत है। UNFPA की 2025 की रिपोर्ट स्पष्ट रूप से कहती है: “असली संकट ओवरपॉपुलेशन या अंडरपॉपुलेशन नहीं है – असली संकट यह है कि लोग अपनी इच्छित संख्या में बच्चे नहीं कर पा रहे हैं।”

भारत की प्रजनन दर 1.9 है, जो प्रतिस्थापन स्तर 2.1 से कम है। इसका मतलब है कि आने वाले दशकों में जनसंख्या वृद्धि रुक जाएगी और फिर घटने लगेगी। यह घटना “डेमोग्राफिक मोमेंटम” के कारण हो रही है – युवा वयस्कों की बड़ी संख्या अभी बच्चे पैदा करने की उम्र में है, इसलिए जनसंख्या बढ़ती रहेगी। लेकिन यह अस्थायी है।

दक्षिण कोरिया, जापान, इटली जैसे देश पहले से ही जनसंख्या में गिरावट का सामना कर रहे हैं। दक्षिण कोरिया की प्रजनन दर 0.8 से भी कम है – दुनिया में सबसे कम। भारत भी इसी दिशा में जा रहा है। कई राज्य पहले से ही इस समस्या से जूझ रहे हैं।

जो लोग “ओवरपॉपुलेशन” की बात करते हैं, वे अक्सर जनसंख्या घनत्व को भूल जाते हैं। हां, भारत की जनसंख्या बड़ी है, लेकिन यह समान रूप से वितरित नहीं है। कुछ राज्य घनी आबादी वाले हैं, जबकि अन्य में काफी जगह है। समस्या जनसंख्या की नहीं, बल्कि संसाधनों के असमान वितरण की है।

UNFPA-YouGov सर्वेक्षण से पता चलता है कि 30% भारतीयों ने कहा कि वे उतने बच्चे नहीं कर पाए जितने चाहते थे, जबकि 23% ने दोनों चुनौतियों का सामना किया – कुछ को अनचाहे बच्चे हुए और कुछ को जितने चाहिए थे उतने नहीं हो पाए। यह “रिप्रोडक्टिव एजेंसी” की कमी है – अपनी मर्जी से बच्चों की संख्या तय करने की क्षमता।

असली मुद्दा यह नहीं है कि बहुत अधिक या बहुत कम बच्चे हो रहे हैं। असली मुद्दा यह है कि लोग अपनी इच्छा अनुसार बच्चे नहीं कर पा रहे हैं। कुछ लोग 3-4 बच्चे चाहते हैं लेकिन आर्थिक या स्वास्थ्य कारणों से नहीं कर पाते। कुछ लोग 1-2 बच्चे चाहते हैं लेकिन परिवार या समाज का दबाव उन्हें अधिक बच्चे करने के लिए मजबूर करता है। और कई लोग बच्चे चाहते हैं लेकिन बांझपन के कारण नहीं कर पाते।

2026 और उसके बाद: भविष्य क्या है?

आने वाले वर्षों में IVF की मांग और बढ़ने की उम्मीद है। 2026 में भारत का IVF बाज़ार लगभग 1,000 मिलियन डॉलर का होने का अनुमान है। कई कारक इस वृद्धि को बढ़ावा दे रहे हैं:

जागरूकता में वृद्धि: लोग अब बांझपन को चिकित्सीय स्थिति के रूप में स्वीकार कर रहे हैं और इलाज की तलाश कर रहे हैं। सोशल मीडिया और सेलिब्रिटीज के खुलकर अपनी IVF यात्रा साझा करने से कलंक कम हो रहा है।

तकनीकी प्रगति: प्री-इम्प्लांटेशन जेनेटिक टेस्टिंग, टाइम-लैप्स इमेजिंग, AI-आधारित भ्रूण चयन – ये सभी तकनीकें सफलता दर बढ़ा रही हैं। Indira IVF जैसी कंपनियां लगातार नई तकनीकों में निवेश कर रही हैं।

पहुंच में सुधार: IVF क्लिनिक अब छोटे शहरों में भी खुल रहे हैं। टियर-2 और टियर-3 शहरों में विस्तार हो रहा है। मेडिकल टूरिज्म भी बढ़ रहा है – अन्य देशों से लोग भारत में सस्ती और गुणवत्तापूर्ण IVF सेवाओं के लिए आ रहे हैं।

सरकारी समर्थन: कुछ राज्य सरकारें IVF के लिए वित्तीय सहायता प्रदान कर रही हैं। सिक्किम इसका एक उदाहरण है। भविष्य में अधिक राज्य ऐसी योजनाएं शुरू कर सकते हैं।

हालांकि, चुनौतियां भी हैं। IVF महंगा है – एक साइकिल में 1.5 से 2.5 लाख रुपये तक खर्च होता है। ज्यादातर लोगों के लिए यह किफायती नहीं है। बीमा कवरेज सीमित है। सरकार को इस क्षेत्र में अधिक निवेश करना होगा।

साथ ही, जनसंख्या में गिरावट के दीर्घकालिक प्रभावों के लिए तैयारी करनी होगी। भारत तेजी से बूढ़ा हो रहा है। वर्तमान में 65 वर्ष से अधिक उम्र की जनसंख्या कुल जनसंख्या का 7% है, जो आने वाले दशकों में बढ़ने की उम्मीद है। 2025 तक, जन्म के समय जीवन प्रत्याशा पुरुषों के लिए 71 वर्ष और महिलाओं के लिए 74 वर्ष होने का अनुमान है।

इसका मतलब है कि युवाओं को बुजुर्गों की देखभाल करनी होगी, जबकि उनकी खुद की संख्या कम हो रही है। सामाजिक सुरक्षा, पेंशन, स्वास्थ्य सेवा – ये सभी क्षेत्र दबाव में आएंगे। सरकार को अभी से इसकी योजना बनानी होगी।

भारत को “रिच” होने से पहले “ओल्ड” नहीं होना चाहिए। डेमोग्राफिक डिविडेंड का लाभ उठाने के लिए 2030 तक हर साल 7.85 मिलियन नौकरियां बनानी होंगी। शिक्षा, स्किलिंग, रोजगार सृजन पर ध्यान देना होगा।

प्रजनन स्वास्थ्य की दृष्टि से, सरकार को व्यापक यौन और प्रजनन स्वास्थ्य सेवाओं तक सार्वभौमिक पहुंच सुनिश्चित करनी होगी – गर्भनिरोधन, सुरक्षित गर्भपात, मातृ स्वास्थ्य, और बांझपन देखभाल। चाइल्डकेयर, शिक्षा, आवास और कार्यस्थल लचीलेपन में निवेश करके संरचनात्मक बाधाओं को दूर करना होगा।

कलंक को चुनौती देने और स्वास्थ्य साक्षरता बढ़ाने के लिए सामुदायिक पहल को बढ़ावा देना होगा। डेटा और जवाबदेही में सुधार – केवल प्रजनन दर से आगे जाकर अधूरी परिवार नियोजन जरूरतों और शारीरिक स्वायत्तता को मापना होगा।

निष्कर्ष: संतुलन की तलाश

भारत एक महत्वपूर्ण जनसांख्यिकीय संक्रमण के दौर से गुजर रहा है। हम न तो ओवरपॉपुलेशन की समस्या से जूझ रहे हैं, न ही अभी तक अंडरपॉपुलेशन की। असली समस्या यह है कि लोग अपनी इच्छा अनुसार बच्चे नहीं कर पा रहे हैं – कुछ चाहकर भी नहीं कर पा रहे, कुछ नहीं चाहते हुए भी कर रहे हैं।

IVF का बढ़ता बाज़ार इस बात का प्रमाण है कि बांझपन एक गंभीर और बढ़ती समस्या है। Indira IVF जैसी कंपनियों की सफलता दर्शाती है कि मांग कितनी विशाल है। लेकिन साथ ही यह भी दिखाता है कि अभी भी बहुत से लोग इलाज तक नहीं पहुंच पा रहे हैं।

हमारे दादा-दादी की पीढ़ी के 4-5 बच्चे और आज की पीढ़ी के 1-2 बच्चों के बीच का अंतर सिर्फ संख्या का नहीं है – यह सामाजिक, आर्थिक, और चिकित्सीय परिवर्तनों का परिणाम है। न तो पुराना मॉडल सही था (जहां महिलाओं का कोई कहना नहीं था), न ही वर्तमान स्थिति आदर्श है (जहां कई लोग चाहकर भी बच्चे नहीं कर पा रहे)।

समाधान यह नहीं है कि लोगों को अधिक या कम बच्चे करने के लिए मजबूर किया जाए। समाधान यह है कि हर व्यक्ति को स्वतंत्र रूप से, सूचित रूप से, और सुरक्षित रूप से यह निर्णय लेने का अधिकार मिले कि उसे कितने बच्चे चाहिए। इसके लिए स्वास्थ्य सेवाओं, आर्थिक सहायता, और सामाजिक सुधार – सभी की आवश्यकता है।

2026 और उसके बाद, भारत को एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाना होगा – युवाओं को अवसर प्रदान करते हुए बुजुर्गों की देखभाल करना, जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित करते हुए प्रजनन अधिकारों की रक्षा करना, और आर्थिक विकास के साथ-साथ सामाजिक कल्याण सुनिश्चित करना। यही भारत के भविष्य का रास्ता है।

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